from the poem मेरी मिटटी के जाये
हादसों में घिरे लोग
अपने साथ ले आते हैं
दुस्साहस भरी अकड
और थोड़ी सी आग
फिर वो मधम रौशनी में
हादसों की आँखों में आँखें डाल कर
रात भर जागते रहते हैं
हादसों के हुजूम में
हादसों के मुकाबिल
हादसों के खिलाफ
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शकुंतला की अंगूठी वाली मछली को समुद्र ने निगल लिया है
क्या विश्लेषण के पास समुद्र का हल है?
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दिन
दिन
सुनहरे चोले वाला
एक शरारती साधू है
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इस वक़्त जब की
मैं ख्वाहिशों की आखिरी साँसों पर लटकी हूँ
तुम सब आओ
मेरे सीने में से अपने अपने अस्तित्व की
एक एक कील तो खींच दो
मैं विदा होने से पहले
अपनी तकदीर को माफ़ करना चाहती हूँ
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